Wednesday, 2 June 2010

भवन के अभाव में पेड़ के नीचे पढ़ते बच्चे

हसपुरा (औरंगाबाद) खूब पढ़ो, खूब खेलो, सर्व शिक्षा अभियान का स्लोगन हसपुरा प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय जलपुरा में बेकार साबित होता दिख रहा है। भवन के अभाव में छात्र-छात्राओं की पढ़ाई बाधित हो रही है। प्रधानाध्यापक सूरजदेव राम के अनुसार विद्यालय में बच्चों की संख्या 350 है। हाल ही विद्यालय उत्क्रमित हुआ है जिस कारण वर्गो की संख्या बढ़ गई है। अब यहां आठ वर्ग तक पढ़ाई होती है। पहले दिवंगत विधायक डीके शर्मा के ऐच्छिक निधि से एक कमरा का निर्माण हुआ था। उसी कमरा में कार्यालय चलता है। बच्चों की पढ़ाई जर्जर भवन में होती है। भवन कब धराशायी हो जाएगा कहा नहीं जा सकता। गर्मी के इस मौसम में छात्र-छात्राओं को परेशानी हो रही है। यहां प्रधानाध्यापक के अलावा शिक्षक विद्यावती देवी, सत्यजीत प्रसाद, विनोद कुमार, रमेश कुमार, नरेश चौधरी शिक्षण कार्य देखते हैं। यह विद्यालय हसपुरा पंचायत में है। इस विद्यालय में आजाद बिगहा, मनपुरा, हरदयाल बिगहा गांव के बच्चे पढ़ते है। भवन के अभाव में बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ने को विवश है।

बिहार शिक्षा परियोजना में घोटाला

औरंगाबाद बिहार शिक्षा परियोजना में लाखों रुपए का चेक घोटाला सामने आया है। अभियंताओं ने प्रधानाध्यापक व पर्यवेक्षक के साथ मिलकर लाखों रुपए की निकासी की है। वैसे डीएसई ओंकार प्रसाद सिंह के अनुसार यह राशि करोड़ों में हो सकती है। डीएसई ने बताया कि मध्य विद्यालय ब्लाक कालोनी गोह को मार्च 2010 में 49 हजार 400 रुपए का चेक काटा गया। गोह थाना के महेश परासी निवासी प्रधानाध्यापक वेंकटेश कुमार के साथ मिलकर अभियंताओं ने 6 लाख 49 हजार 400 रुपए की निकासी की। इसी तरह कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय देव को फरवरी 2010 में 45 हजार रुपए का चेक काटा गया जिसे अभियंता, पर्यवेक्षक एवं संचालिका ने मिलकर 3 लाख 45 हजार रुपए की निकासी की। अभियंताओं ने जिन चेकों में हेर फेर किया उसमें नवसृजित प्राथमिक विद्यालय सिमरी बेचैन, प्राथमिक विद्यालय धुसरी एवं मध्य विद्यालय ब्लाक कालोनी देव शामिल है। डीएसई ने बताया कि 31 मार्च 2010 को मध्य विद्यालय ब्लाक कालोनी देव को 23 हजार रुपए का चेक दिया गया। इस चेक को अभियंताओं ने 2 लाख 23 हजार रुपए बनाकर पैसे की निकासी की। धुसरी विद्यालय में 5 लाख 70 हजार की जगह 6 लाख 70 हजार रुपए, सिमरी बेचैन में 51 हजार की जगह 91 हजार रुपए की निकासी की गई। जांच के दौरान जब अवैध पैसे की निकासी का मामला पकड़ा गया तो डीएसई ने मामले में प्राथमिकी के आदेश दिए। डीएसई के आदेश पर बिहार शिक्षा परियोजना के लेखा पदाधिकारी चन्द्रप्रकाश सिंह ने नगर थाना में सहायक अभियंता धनंजय कुमार, अभियंता नरेन्द्र कुमार दूबे, पर्यवेक्षक विनोद कुमार, तकनीकी पर्यवेक्षक कृष्णा शर्मा, सत्यनारायण सिंह, प्रधानाध्यापक वेंकटेश कुमार, श्रीमती शारदा कुमारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। थानाध्यक्ष ने बताया कि भादसं की धारा 420, 467, 468, 353, 120 बी के तहत कांड संख्या 241/10 दर्ज की गई है। कांड के अनुसंधानकर्ता दारोगा जेपी यादव बनाए गए है। डीएसई के इस कार्रवाई से सर्व शिक्षा अभियान में हड़कंप व्याप्त है।

अरबों के बजट में करोड़ों की हेराफेरी

औरंगाबाद बिहार शिक्षा परियोजना के 'अरबों' रुपए के बजट में 'करोड़ों' की हेराफेरी हुई है। स्कूल में भवन निर्माण के नाम पर अभियंताओं ने पैसे की लूट की है। वर्ष 2002 से चल रहे इस परियोजना के कार्यो की जांच ईमानदार अधिकारी से करा दी जाए तो कई घोटाले उजागर होंगे। जब से परियोजना की शुरुआत हुई है यह विभाग सवालों के घेरे में रहा है। डीएसई ओंकार प्रसाद सिंह भी स्वीकारते हैं कि परियोजना में लाखों रुपए का घोटाला हुआ है। वे साफ कहते हैं 'जो दोषी होगे उनके खिलाफ जांच कर प्राथमिकी दर्ज की जाएगी।' डीएसई ने कहा कि अब तक घोटाला की दो प्राथमिकी दर्ज की गई है और कई मामलों की जांच की जा रही है। बताया जाता है कि वित्तीय वर्ष 2009-10 में इस परियोजना के बजट 1 अरब 26 करोड़ रुपए थी। लेखापाल के नहीं होने के कारण पैसा खर्च नहीं हो पा रहा था। पांच माह पहले इस विभाग को लेखापाल मिला और चेक काटने की सिलसिला शुरू हुआ। भवन निर्माण के नाम पर करीब 70 से 80 करोड़ रुपए के चेक काटे गए परंतु यह चेक 90 करोड़ पार कर गया। हुआ यह कि लेखा विभाग से जो चेक 45 हजार रुपए का कटा वह 3 लाख 45 हजार रुपए का हो गया। जो चेक 49 हजार 400 रुपए का कटा वह 6 लाख 49 हजार 400 रुपए का हो गया। इतना ही नहीं 23 हजार का चेक 2 लाख 23 हजार बन गया। सहायक अभियंता धनंजय कुमार ने चेक से रुपए घोटाला का ऐसा खेला कि विभागीय अधिकारी दंग रह गए। अपने अंगुलियों पर सर्व शिक्षा अभियान को नचा रहा धनंजय डीएसई के करीबी थे। डीएसई के विश्वासपात्र रहे धनंजय ने भवन निर्माण के नाम पर लाखों रुपए डकारा है। चर्चा है कि धनंजय के द्वारा जो भी चेक विद्यालय को भेजा गया उसकी रकम बढ़ा दी गई है। कई मामलों की जांच अभी चल रही है। इस विभाग में लूट की छूट रही। लोग कारण डीएसई को मानते हैं। लोगों का कहना है कि अगर डीएसई कार्यालय में नियमित बैठते और फाइलों को देखते तो इतना बड़ा रकम घोटाला नही होता। चर्चा यह भी है कि सहायक अभियंता धनंजय डीएसई के करीबी थे। जो भी मामले डीएसई के पास पहुंचते थे उसकी जांच वे धनंजय को ही देते थे। धनंजय के करीबी होने के सवाल पर डीएसई बोले 'नाई के दुकान पर कोई दाढ़ी बनाने यह सोच थोडे़ ही जाता है कि वह दाढ़ी नहीं गला काटेगा।' डीएसई ने कहा कि धनंजय के खिलाफ अगर हमें सौ प्राथमिकी भी दर्ज करना पड़ेगा तो हम पीछे नही हटेंगे। बहरहाल, सहायक अभियंता धनंजय कुमार, कनिय अभियंता नरेन्द्र कुमार दूबे पर हुई प्राथमिकी से यह साफ हो गया है कि इस विभाग में चेक से रुपए का बड़ा घोटाला हुआ है।

न जाने कितने का भविष्य शिक्षा ऋण न मिलने की वजह से बर्बाद हो जाता है।

दाउदनगर (औरंगाबाद) बेटियों को पढ़ाने के लिए असमर्थ अभिभावकों को शिक्षा ऋण में अनंत संभावनाएं नजर आती हैं। सरकार खूब प्रचार करती है, मगर वास्तविक में ऐसा है नहीं। न जाने कितने का भविष्य शिक्षा ऋण न मिलने की वजह से बर्बाद हो जाता है। उदाहरण के रूप में अनुपमा कुमारी का मामला सामने है। उसके पिता शिवकुमार प्रसाद ने पिछले वर्ष अगस्त महीने में शिक्षा ऋण के लिए भारतीय स्टेट बैंक की दाउदनगर शाखा में आवेदन देने की कोशिश की। शाखा प्रबंधक ने यह कहकर टरका दिया कि मैनेजमेंट कोर्स के लिए लोन नहीं मिलता। आवेदन वापस कर दिया। बैंक के सीजेएम के पास आवेदक गए तो उन्होंने प्रबंधक को डांटा और कहा कि साधारण शिक्षा के लिए भी लोन मिलता है, इसलिए आवेदन स्वीकार करो। आवेदन को स्वीकार कर लिया गया। अगस्त से लेकर अप्रैल महीने तक लगातार आवेदक को दौड़ाया जाता रहा। मई के अंतिम सप्ताह में आरसीसीसी औरंगाबाद द्वारा यह कहकर आवेदन खारिज कर दिया गया कि मैनेजमेंट कोर्स के लिए शिक्षा ऋण नहीं मिलता। अब उसकी परीक्षा 2 जून को होनी है और पिता के पास सेकेंड समेस्टर के लिए निर्धारित रकम 3 लाख 43 रुपये नहीं है। ऐसे में बेटी का भविष्य बर्बाद होता हुआ देखने के अलावा एक बाप के पास क्या विकल्प बच जाता है। अंतिम समय आवेदन खारिज होने से पिता और पुत्री दोनों के सामने विकट स्थिति आ गई है। अनुपमा ने 28 मई को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि बैंक द्वारा लोन न देने के कारण मुझे वहां खड़ा कर दिया है जहां से निराशा और हताशा की शुरूआत होती है। और अंतत: मृत्यु को प्राप्त करना नियति बन जाती है। अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए उसने लिखा है कि कई लड़कियों को मैनेजमेंट के लिए शिक्षा ऋण मिला है, यह झूठ नहीं है। उसने लिखा है 'मैं काफी थकावट महसूस कर रही हूं और अवसाद ग्रस्त हूं, मेरे लिए यह बुरी अवस्था है।' एक जून को उसने मुख्यमंत्री के अलावा मीडिया कार्यालयों को भी अंग्रेजी में लिखा पत्र फैक्स किया है। उसे अब न्याय की उम्मीद नहीं है। लेकिन उसने जागरण को बताया कि वह चाहती है कि कम से कम अन्य छात्र-छात्राओं को ऐसा दिन न देखना पड़े। ऐसी व्यवस्था शिक्षा ऋण के मामले में सरकार को करनी चाहिए जिससे पढ़ने वालों को समय पर ऋण मिले। अब शायद बिहार सरकार की कोई पहल उसे नई जिंदगी दे सके।