इस ब्लॉग में औरंगाबाद(बिहार) से संबंधित वैसे खबरों को पोस्ट किया जाता है, जिसपर वरीय पदाधिकारियों का ध्यान आकर्षित कराना अत्यावश्यक लगे । इसके सेटिंग में मुख्य सचिव (बिहार), पुलिस महानिदेशक (बिहार), जिला पदाधिकारी (औरंगाबाद), पुलिस अधीक्षक (औरंगाबाद) तथा माननीय मुख्यमंत्री (बिहार) का इमेल आईडी फीड किया हुआ है, जिससे ब्लॉग पोस्ट की एक प्रति स्वतः उनके पास पहुँच जाती है । यह बिल्कुल से अखबारों में छपे मूल समाचार होते हैं और मेरा उद्देश्य इन खबरों को वरीय पदाधिकारियों तक पहुँचाना मात्र है ।
Sunday, 3 April 2011
अग्निशमन यंत्र खरीद में घोटाले की बू
दाउदनगर (औरंगाबाद), जागरण प्रतिनिधि : सर्वशिक्षा अभियान के तहत तमाम सरकारी मध्य एवं प्राथमिक विद्यालयों का भवन या तो बन गया है या बन रहा है। सभी स्कूल भवन पक्के के हो गए हैं। लकड़ी का आलमीरा पुराने दिनों की बात हो गई है। विद्यालयों में लोहे के चमचमाते आलमीरा दिख जाते हैं। कम से कम विगत डेढ़ दशक में किसी सरकारी स्कूल में आग लगने की घटना नहीं घटी है। न टेबूल जली है न कुर्सी और न ही दस्तावेज फिर भी किस डर से सरकार तमाम स्कूलों में अग्निशमन यंत्रों की आपूर्ति सुनिश्चित कर रही है यह अपने आप में सवाल है। बिहार शिक्षा परियोजना परिषद ने 7 फरवरी 2010 को एक पत्र (पत्रांक 1122) जारी किया था। इसी के आलोक में करीब एक साल बाद 5 मार्च 2011 को डीएसई सह जिला कार्यक्रम समन्वयक ने सभी बीईओ को अग्निशमन यंत्र खरीदने का आदेश दिया है। पत्र में यह भी कहा गया है कि 2 अप्रैल 2011 तक क्रय नहीं करने पर संबंधित विद्यालय के प्रधानाध्यापक एवं वरीय शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई होगी। इसके अलावा तमाम शिक्षकों के अनुसार यहां मौखिक आदेश उच्चाधिकारी से प्राप्त है कि मेसर्स फ्रेंडस इंटरप्राइजेज से ही अग्निशमन यंत्र क्रय करना है। सभी मध्य विद्यालयों को 5 और प्राथमिक विद्यालयों को 2 यंत्र क्रय करना है। दबी जुबान से विद्यालयों के प्रधान शिक्षक कहते हैं कि कमीशन के लिए यंत्र खरीदवाया जा रहा है। कोई शिक्षक इसे खरीदना नहीं चाहता क्योंकि बाजार से तीन गुना मूल्य पर यह दिया जा रहा है। दूसरा यह कि चेक लेने के कई दिनों बाद अग्निशमन यंत्र की आपूर्ति की जाएगी। बीआरसी भवन में बड़ी मात्रा में अग्निशमन यंत्र रखे जाने की सूचना है। हालांकि यहां दुकान नहीं खोला गया है। इस मामले में बीईओ का पक्ष जानने की कोशिश की गई लेकिन वे जिला मुख्यालय में किसी बैठक में शामिल होने गए हैं। दाउदनगर के संदर्भ में अगर देखें तो यहां इक्का दुक्का स्कूल ही इसे खरीद पाए हैं। माना जा रहा है कि शिक्षक नेताओं की वजह से उच्चाधिकारियों का मौखिक आदेश यहां टांय टांय फिस्स है। मामले की गहन जांच की जरूरत है। गत वर्ष यह यंत्र यहां 3774 रुपए में विद्यालयों ने खरीदा था और कुछ विद्यालयों में इसका मूल्य दो से ढाई हजार रुपए रहा था। सवाल उठता है कि एक साल में ही दाम करीब दुगुना कैसे हो गया जबकि बाजार में यही सामग्री दो से ढाई हजार रुपए में उपलब्ध है।
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