Thursday, 26 November 2009

अदालत में देना पड़ा जिंदा होने का सबूत.

औरंगाबाद पुलिस रिकार्ड में मृत हसपुरा थाना के मुंजहर गांव निवासी जनकदेव शर्मा गुरुवार को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश चतुर्थ बैजनाथ की अदालत में गवाही देने पहुंचे तो उन्हे जिंदा रहने का 'सबूत' देना पड़ा। गवाही लेने से पहले न्यायाधीश ने जनकदेव से पूछा 'आप तो मर चुके है यहां कैसे पहुंचे।' जनकदेव ने पहचान पत्र दिखाते हुए कहा 'मैं जिंदा हूं, मेरे मरने की सूचना पुलिस ने गलत दी है साहब।' अपर लोक अभियोजक राजाराम चौधरी ने भी न्यायालय को बताया कि पुलिस ने अभियुक्त से मिलकर यह सब किया है। बताया जाता है कि वर्ष 1989 में जनकदेव की पुत्री वृदामनी की हत्या ससुराल वालों ने दहेज के लिए कर दी थी। हत्या की प्राथमिकी उन्होंने दाउदनगर थाने में दर्ज कराई थी। मामले के अभियुक्त वृदामनी के पति कृष्णा पाण्डेय जेल में बंद है। हत्या के पन्द्रह वर्ष गुजर जाने के बाद जब जनकदेव को न्याय नहीं मिला तो उन्होंने न्यायालय आना छोड़ दिया। इसी बीच न्यायालय से जनकदेव के खिलाफ सेशन ट्रायल नंबर 89/90 / 45/90 में गवाही के लिए वारंट निर्गत हुआ। हसपुरा थाना पुलिस ने बगैर जांच किए वारंट यह कहते हुए लौटा दिया कि वारंटी के घर खोजबीन किया, ग्रामीणों से पूछा और चौकीदार कन्हाई यादव ने बताया कि जनकदेव शर्मा पांच वर्ष पहले मर चुके है। इसी मामले में जब वे गुरुवार को गवाही देने पहुंचे तो न्यायालय में उन्हे जिंदा रहने का साक्ष्य प्रस्तुत करना पड़ा। पुलिस के इस रवैये से आक्रोशित जनकदेव ने कहा कि थानाध्यक्ष ने अभियुक्त से मिलकर यह कार्य किया है। इस संबंध में पूछे जाने पर हसपुरा थानाध्यक्ष शब्बीर अहमद ने बताया कि मामले की जांच एएसआई सभापति राम ने की थी। उन्होंने जिंदा व्यक्ति को कैसे मृत घोषित किया यह हम नहीं जानते। उस समय हम अवकाश पर थे।

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